भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी: आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक
- sudeshdesai406
- Jan 19
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भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी: आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक
Bharatendu Harishchandra biography in Hindi को समझना हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण अध्याय को जानना है। भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर, 1850 को वाराणसी के एक धनी अग्रवाल परिवार में हुआ था। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का ‘जनक’ या ‘पितामह’ कहा जाता है। उन्होंने न केवल हिंदी गद्य को समृद्ध किया, बल्कि समाज सुधार और राष्ट्रीय चेतना जगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
भारतेंदु जी का बचपन विषम परिस्थितियों में बीता। अल्पायु में ही उन्होंने अपनी मां और पिता, गोपाल चंद्र, को खो दिया। उनके पिता भी एक कवि थे, जिनसे उन्हें साहित्य की प्रेरणा मिली। उन्होंने कुछ समय के लिए क्वींस कॉलेज, वाराणसी में शिक्षा प्राप्त की, लेकिन साहित्य के प्रति अपने प्रेम के कारण उन्होंने औपचारिक शिक्षा बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने स्वयं अध्ययन करके हिंदी, बांग्ला, गुजराती, मराठी और संस्कृत जैसी कई भाषाओं पर अधिकार प्राप्त किया।
साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य को आधुनिकता की ओर मोड़ा। उन्होंने उस समय की प्रचलित ब्रजभाषा की जगह आम बोलचाल की ‘खड़ी बोली’ को साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया। इससे साहित्य आम जनता के लिए अधिक सुलभ हो गया। उन्होंने लगभग 175 से अधिक रचनाएँ कीं, जिनमें नाटक, कविता, उपन्यास, निबंध, यात्रा वृत्तांत आदि शामिल हैं।
प्रमुख नाटक
उनके नाटक तत्कालीन समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखे प्रहार थे। कुछ प्रमुख नाटक हैं:
अंधेर नगरी: यह एक हास्य-व्यंग्य प्रधान नाटक है जो मूर्ख राजा और भ्रष्ट तंत्र पर कटाक्ष करता है।
भारत दुर्दशा: यह भारत की तत्कालीन दुर्दशा का मार्मिक चित्रण है और भारतीयों को स्वाधीनता के लिए प्रेरित करता है।
विषम विमोदक: सामाजिक बुराइयों पर आधारित एक महत्वपूर्ण नाटक।
सती प्रताप: सती प्रथा जैसी कुरीति पर आधारित नाटक।
पत्रकारिता और संपादन
भारतेंदु जी एक सफल पत्रकार और संपादक भी थे। उन्होंने ‘कवि वचन सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ (बाद में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’) और ‘बाला बोधनी’ जैसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने साहित्यिक चर्चाओं को बढ़ावा दिया, सामाजिक सुधारों की वकालत की और राष्ट्रीय भावना का संचार किया। ‘बाला बोधनी’ विशेष रूप से महिलाओं के लिए ही प्रकाशित की जाती थी, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।
समाज सुधारक के रूप में भूमिका
भारतेंदु हरिश्चंद्र केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक सजग समाज सुधारक भी थे। उन्होंने बाल विवाह, पर्दा प्रथा, जाति-पाति के भेद और विधवा पुनर्विवाह की समस्या जैसी सामाजिक बुराइयों का डटकर विरोध किया। उन्होंने शिक्षा, स्वच्छता, और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर बल दिया। उनका मानना था कि साहित्य को समाज की सेवा करनी चाहिए।
भारतेंदु युग का सूत्रपात
उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व और साहित्यिक अवदान के कारण उनके युग को ‘भारतेंदु युग’ कहा जाता है। उन्होंने अनेक नए लेखकों को प्रोत्साहित किया और हिंदी साहित्य में एक नवजागरण का सूत्रपात किया।
निष्कर्ष
6 जनवरी, 1885 को मात्र 34 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया, लेकिन भारतेंदु हरिश्चंद्र की अमूल्य देन आज भी हिंदी साहित्य और समाज को दिशा दिखा रही है। उनकी Bharatendu Harishchandra biography in Hindi प्रेरणा का स्रोत है, जो हमें भाषा, साहित्य और समाज के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाती है।
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